डर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

डर सा लगता बोलूँ कैसेराज मन की खोलूँ कैसे।प्यार करता ये है मालूमदिल उनका टटोलूँ कैसे।बीच में आते शत्रु सारेप्यार गली में डोलूँ कैसे।पास नहीं दूर – दूर रहतीहाथ गंगा में धोऊँ कैसे।बिन्दु उसके फिराक में हैपागल मन को झेलूं कैसे।

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  1. C.M. Sharma 11/01/2019

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