तुम्हारे बिना

लब खामोश रहे लेकिन ख्वाहिश गूंजी सूने भवनों मेंतेरी आँखों के दो आंसू आ टपके मेरे नयनों में।तेरा मेरा नाता क्या है सिसक सिसक कर पीड़ा रोयेमुस्कानों से क्षमा याचनाकरती अपने नैन भिगोए।दर्द बहुत दे जाती हूँकितना तुझको तड़पाती हूँफिर भी मेरी हमराह बनीक्यों तूने ऐसी राह चुनी।कोई जगा न पाए तुझकोसोई तू ये किन शयनों मेंतेरी आँखों के दो आंसूआ टपके मेरे नयनों में।घना कुहासा सर्द रात है तारों की पूरी बारात हैस्वप्न लोक के किस मधुबन मेंचाँद कहाँ तुम किस आंगन मेंविरह अग्नि में झुलसे तन मनआकृतियों से सूना दर्पणअपनों की है भीड़ बड़ीपर छूट गया वो अपनापनथक हार कर तुझको आखिरढूंढू तेरे संचयनो में तेरी आँखों के दो आंसूआ टपके मेरे नयनों में।-देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 11/01/2019
  2. C.M. Sharma 11/01/2019

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