नगीने – शिशिर मधुकर

मुहब्बत खुद उमड़ती है कभी हम तुम जो मिलते हैंमहकते फूल देखो कितने फिर बगिया में खिलते हैं भले आवाज़ ना आए पर हम सब कुछ समझ लेंगेतेरे लब क्या बताने को इतने धीमे से हिलते हैंकठिन राहों पे उल्फ़त की सभी तो चल नहीं पाते डटे रहते हैं जो इन पे बदन उनके ही छिलते हैंये क्या दुनिया बना इंसान ने ख़ुदगर्जी को पाला है दिल का सच कह नहीं पाते लोग होंठों को सिलते हैंखेल ये ज़िन्दगी के इतने भी आसां नहीं मधुकरनगीने दिल में बस जाएं कहाँ वो सबको मिलते हैं शिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 09/01/2019
    • Shishir "Madhukar" 11/01/2019

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