पिंजड़े का परिंदा

1कौन यहाँ कब तक जिंदा हैहर कोई बस पिंजड़े में बंद परिंदा हैकोई स्वप्न के धागे में उलझ करज़िन्दगी को सीलने चला हैकोई अपनो के सिर पर पैर रख करखुद को आगे बढ़ाने चला हैबहुत प्रतिस्पर्धा है भाई साहबखुशियां किसे रास नहीं आती तभी तो इन्हें बेचने-ख़रीदने का सिलसिला चल पड़ा हैधरम-जात के नाम पर हर कोई जीतने चला हैइंसानियत को हिमशीतक में छोड़ करलहू को इंसान पीने चला है 2इनकी आत्माओं पर इनका अधिकार कहाँये दारू की बोतल पर बिकने वाली जनता हैजो गूंगी भी हैं और बहरी भी हैंजीतता भले ही कोई हो चुनावी मौसम मेंपर हारते यही हैंक्योंकि ये धर्म के नाम पर लड़ते हैये जाति के नाम पर बँटते हैये शक्तिहीन शक्तिमान हैया अपनी शक्ति को भूले हनुमान हैइनकी गरीबी और लाचारी जायज हैक्योकि अगर ये खत्म हो जाएगीतो ये पिंजड़े से उड़ जायेंगेइनका पिंजड़े में रहना ही अच्छा है —अभिषेक राजहंस

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10 Comments

    • Abhishek Rajhans 10/01/2019
  1. Gopal Thakur 03/01/2019
    • Abhishek Rajhans 10/01/2019
  2. C.M. Sharma 04/01/2019
    • Abhishek Rajhans 10/01/2019
  3. Ram Gopal Sankhla 04/01/2019
    • Abhishek Rajhans 10/01/2019
  4. डी. के. निवातिया 07/01/2019
    • Abhishek Rajhans 10/01/2019

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