दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

 बीते बचपन खेल में, गये जवानी हार।बूढ़े बैठे रो रहे, यह जीवन का सार ।।दो दिल देखो मिल रहे, दिल में ले अंगार।ऐसा ही अब चल रहा, कलयुग का व्यापार।।सदा सहायक बन रहे, सबके मीठे बोल।जैसी करनी आपकी, वैसा उनका मोल।।मन में धीरज जो रखे, उनके मंगल काज।जो खोता विश्वास है, अटके भटके आज।।किससे दुख अपना कहें , किससे रोना रोय।एक आश भगवान का,  हरे नहीं दुख कोय।।

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