लौट आओ अब

क्या सच में वो तुम ही थीबताओ नाक्या तुम लौट आयी थीआज सुबह जब आंखे खोली थी मैंनेतो तुम्हारे होने का एहसास हुआ थातुम्हारे ड्रेसिंग टेबल का दराज आधा खुला हुआ थातुम्हारी तस्वीर से लगी वो फूलों वाली मालाजमीन पर पड़ी थीबोलो ना ,तुम आ रही थी वापसये इशारा था ना तुम्हारातुम बोलती तो खुद आ जाता मैंमायके में गुस्सा हो कर कितनी बार गयी थी तुमपहले भी तो लौट आती थी तुममेरे मनाने परमानाकि बहुत उलझा हुआ था मैंपर तुम मुझे सुलझा तो सकती थीइस तरह तुम क्यों चली गयी थीदेखो ,मेरी दाढ़ी सफेद हो रही हैतुम्हारी चूड़ियों की खनक अब सुन नही पा रहालौट आओ अबसात जन्म की सात कसमे खायी थी साथ मेंफिर क्यों चली गयीकिचन से प्रेसर कुकर की आवाज क्यों नही आती अबक्यों मेरे बिछावन की सिलवटों में तेरा एहसास नहीं होता अबक्यों कोई रात मुझे सुला नहीं पातीक्यो कोई सुबह मुझे जगा नहीं पातीदेखो, बहुत कर ली अपनीअब अपने अस्थि-कलश से निकलकरया दीवार की तस्वीर से निकलकरलौट आओ अबदरवाजे खुले हुए हैलौट आओ अब—–अभिषेक राजहंस

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  1. C.M. Sharma 26/12/2018

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