गीत-“जब–जब मैंने खुद को हारा ”-शकुंतला तरार

जब–जब मैंने खुद को हारा  जब–जब मैंने खुद को हारातब-तब तुमको पाया है |यह भेद समझ ना आया है |जाने किस नगरी से मन काउड़न खटोला आया हैयह भेद समझ ना आया है || खेल है क्या और कौन ख़िलाड़ीतुमने जाना ना मैंने समझादिल की चौसर कैसे बिछ गईकैसे मन को भरमाया है |यह भेद समझ ना आया है || किस विधि मैंने तुमको पायाकिस विधि खुद से हार गईकैसे मैं बन गई पुजारनतुमने कैसे अपनाया है |यह भेद समझ ना आया है || हार जीत के इस खेला मेंहम-तुम हम-तुम खूब मिलेभूल गए सब शिकवे गिलेइक दूजे को मीत बनाया है |यह भेद समझ ना आया है ||शकुंतला तरार

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3 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 23/12/2018
  2. C.M. Sharma 24/12/2018
  3. Shishir "Madhukar" 25/12/2018

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