गीत-मैं वो गाँव लिखती हूँ-शकुंतला तरार

“”मैं वो गाँव लिखती हूँ”” मुझे मौका मिले जब भी तो मैं वो गाँव लिखती हूँजहाँ अमराइयों की हो वो शीतल छाँव लिखती हूँ || जहाँ बूढ़े से बरगद की घनी छाया बुलाती हैजहाँ पीपल की शीतलता मेरे मन को लुभाती हैसुकूं मिलता मेरे दिल को जहाँ वो ठाँव लिखती हूँ || न हिंदू हैं न मुस्लिम हैं वहां पे भाईचारा हैबंधी हो डोर रिश्तों की बटोही अब भी प्यारा हैउठे सबकी दुआ में हाथ ऐसा दाँव लिखती हूँ ||शकुंतला तरार

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 24/12/2018
  2. Shishir "Madhukar" 25/12/2018

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