बेहिसाब – शिशिर मधुकर

तुझको ख़बर, ए गुल नहीं, तुझ पर शबाब हैऐसा लगे, ज्यों इस पेड़ पर , लटकी शराब है नज़रों से मेरी, देख ले तू, खुद को, एक बार तुझको लगेगा, तुझ पे ये रूप , बेहिसाब हैमुझको थी तेरी जुस्तजू, पर, तू, गैर को मिलादोष दें, किसको यहाँ, मेरी किस्मत ख़राब हैजिसको पढ़ के, मैं कभी, थक सकता ही नहींखुशबू से भरे, हुस्न की तू वो, असली किताब हैतेरे हुस्न की, तारीफ़ मैं, अब किस तरह,करूँखुद में ही मधुकर, तू जहाँ में, एक खिताब है शिशिर मधुकर

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3 Comments

  1. kiran kapur gulati 20/12/2018
    • Shishir "Madhukar" 20/12/2018
  2. C.M. Sharma 20/12/2018

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