आंखें नम नही करता

क्या करूँ  दिनभर, मन  नही  लगतावो  तुम्हारा  फोन,  अब  नही  लगता…..ख्वाब अब  तो सारे, मर  से गये  हैदिल  अपनी बात, अब नही  करता…..मंदिर ओ मस्जिद  के, चक्कर  छूट गयेख्वाइशें  पूरी  मेरी जो, रब  नही करता…..सच  कहते है  लोग, हद पार  कर दी हैकरता  तो हूँ  लेकिन, सब  नही  करता…..मोहब्बत  का मजा,  उतरने  लगता  हैप्यार  से मगर  कोई, जब  नही  लड़ता…..देते है  अपने भी  दगा, वक्त  पर  लेकिनआदत  हो गयी  इसलिए, गम  नही करता…..एक एक शब्द में तुम्हारी, सूरत दिखती थीछुपा कर रखा तुम्हारा, वो खत नही पढ़ता…..दूर हो  तुम फिर  भी,आंखें नम  नही  करताप्यार भी तुमसे लेकिन, कुछ कम नही करता

 कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया 15/12/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma 15/12/2018
  3. shrija kumari 15/12/2018
  4. sarvajit singh 15/12/2018

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