कुछ नहीं बचा अब

कुछ नहीं बचा अबसब खत्म हो गयाउम्मीद की बूंद का आखिरी कतरा भीआज आंखों से बह गयाबंद कमरे का अंधेराआज मुझसे मेरी रोशनी छीन गयाकुछ नही बचा अबबस कुछ ख़्वाब बचे थेवो भी टूट गएअब और कुछ रंगने को रंग नहीं बचाकुछ लिखने को स्याही नहीं बचीअब और क्या कहूँलहू को पसीना बनाने का शौक रखता था कभीलीक से हटकर चलने पर यकीन रखता थामंजिल की तलाश में बेपरवाह भटकता था कभीआज वक़्त ने कुछ ऐसे तोड़ा हैबस चंद साँसे बची है हिस्से मेंऔर मेरा बीतता वक़्त मुझे अंदर ही अंदरतोड़ रहा हैकुछ नही बचा अबटूटती उम्मीदों के संगअब साँसे भी धीरे-धीरे टूट रही है—अभिषेक राजहंस

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3 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 13/12/2018
  2. डी. के. निवातिया 13/12/2018
  3. C.M. Sharma 14/12/2018

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