ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

मुझे बेच दो दूसरे के हाथ , ये मंजूर नहींमैं झुका हुआ जरूर हूँ, इतना मजबूर नहीं।मुझे मेरे हाल पर यूँ, तड़पने के लिए छोड़ दोमुझे मालूम है , मैं आपके जैसा मशहूर नहीं।तिश्नगी में तड़प – तड़प कर, जान हम भी दे देंगेइस दस्तूर के लिये, हमारा कोई कसूर नहीं।हम तो चाहते थे भला , अपने जमाने के लियेजालिमों ने रौंद डाला, मैं इतना मगरूर नहीं।कलेजा अपना ‘बिन्दु’, पहाड़ पत्थर का रखता हैशिकस्त दे दे कोई भी , ऐसा अब दस्तूर नहीं।

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3 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 13/12/2018
  2. C.M. Sharma 14/12/2018
  3. C.M. Sharma 14/12/2018

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