क्या तुमने कभी देखा है – डी के निवातिया

क्या तुमने कभी देखा है ?

!अपने इर्द-गिर्द सर्द दीवाली को गर्मी में हाँफते हुएटूटे सपनों में सिमटी गरीबी को आँचल ढांपते हुएआतिशबाज़ी की गड़गड़ाहट में छुपे अंर्तद्वंद कोसूने मन में पसरे अंधियारे को, द्वार झांकतें हुए !!

क्या तुमने कभी देखा है ?टकटकी लगाए प्यासी आँखों को ताकतें हुएअँधेरे में छुपी अपनी परछाई को नापतें हुएकिसी अपने की बाट जोहते हुए सन्नाटे कोह्रदय द्वार चीरकर धैर्य सीमा लांघतें हुए !!

क्या तुमने कभी देखा है ?दीपक की चकाचौंध में खुद को खोते हुएहसँते हुए लबों संग अंतर्मन को रोते हुएअंधे धवल सन्नाटे में गूँजते कर्कशनादको निष्ठुर काल के गर्भ में सोते हुए !!

!

शायद तुमने देखा है,….. या नहीं…??

!मगर हाँ देखा है, मैंने देखा है !!अर्धनग्न, निर्बल, तंग, भूखें पेट मुस्कुरातें बाल गोपालो में !तन को खुद में समेटती सबला नारी के अधखिले अधरों में !वृद्ध फड़फड़ाती जर्जर अस्थियों की टकटकी लगाए आँखों में !किसी बेबस लाचार इंसान की मन मलीन सिसकती आहों में !!

हाँ देखा है,…. मैंने देखा है…!!रुंआसी आँखों के नजारो में !!बहतें कारे कजरे की धारो में !!अब कुछ कहा नहीं जाता मुझसे ,समझ लो यारो बस तुम इशारो में !!!!!डी के निवातिया

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15 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 06/12/2018
    • डी. के. निवातिया 07/12/2018
  2. ambikesh 07/12/2018
    • डी. के. निवातिया 07/12/2018
  3. C.M. Sharma 07/12/2018
    • डी. के. निवातिया 11/12/2018
  4. Bindeshwar Prasad sharma 07/12/2018
    • डी. के. निवातिया 07/12/2018
  5. डी. के. निवातिया 07/12/2018
  6. kiran kapur gulati 10/12/2018
    • डी. के. निवातिया 11/12/2018
    • sukhmangal singh 03/01/2019
      • dknivatiya 30/04/2019
  7. kiran kapur gulati 10/12/2018
    • डी. के. निवातिया 11/12/2018

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