मेरे देश की औरते

औरतेमेरे देश की औरतेबड़ी विचित्रता का बोध कराती हैअपने आत्मसम्मान की चिंता किये बिनासब कुछ करती जाती हैवो बस सबसे प्रेम करती जाती हैअपनो के लिए , अपनी बन कर रह जाती हैहम पुरुषों के जीवन मे तो प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करती हैंकभी माँ बन कर स्नेह करती हैलोरियां गाती हुई अपनी ही नींद भूल जाती हैकभी पत्नी बन करचूल्हे पर दूध उबलता छोड़ करपति के गले की पट्टी(टाई) बांधने आती हैकभी ऐनक साफ कर रामायण का पाठ करती हुईबहू को आदेश फरमाती रहती हैदिन-दिन भर भूखे रह करजाने क्यों वो उपवास करती हैवो ईश्वर के सामने बार -बार कुछ बुदबुदाती रहती हैसब के लिए हर पूजा के बहाने कुछ मांगती रहती हैसचमुच अजीब है ना औरतेमेरे देश की औरतेहम पुरूष उन्हें कभी समझ ही नहीं पातेउन्हें बस उपभोग करते रहते हैजब वो बेटी बनकर आने वाली होती हैंतो हम डर जाते हैंउसे आने ही देना नही चाहतेये जान कर भी की ये नही होंगीतो फिर हम कैसे होंगेहम मुश्किल से उसे अपनाते हैंइनके आँसुओ को भी हम समझ नहीं पातेवो चुपचाप सी रहकर एक पेड़ की तरहसब कुछ बस देती ही जाती हैबेटी से पत्नी, पत्नी से माँबहू ,ननद ,बहन सब कुछ बन करबस अपनी सांसे हमारे लिए जीती जाती हैऔर अपनी खुशियों को किसी तहखाने में बंद करउस पर बड़ा सा ताला लगा जाती हैहम पुरुष भी तो उसे बसचाभी वाली गुड़िया ही समझते हैंजितना उमेठते है उतनी ही दूर जा पाती हैसचमुच अजीब है ना औरतेंमेरे देश की औरते—-अभिषेक राजहंस

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2 Comments

  1. रामगोपाल सांखला ``गोपी`` 01/12/2018
  2. Mansi yadav 01/12/2018

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