अपना शहर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

अपना ही शहर क्यों बेजान सा लगता हैजर्रा जर्रा मुझे अब अंजान सा लगता है।

भूले अपनी काबिलियत तुम्हें देखकरबदले हुए नजारे परवान सा लगता है।देखकर मुझे क्यों जलते हैं जमाने वालेमुसाफिर कोई भी मेहमान सा लगता है।किसकी खबर कौन रखता है बरखुरदारभरा भरा सा घर सिर्फ मकान सा लगता है।मतलब के लोग अब ऐसे मिलते कहाँ हैंनाकाब में छुपकर बेईमान सा लगता है।

परवान – सबूत, हद।

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