समय तन्हाई का – शिशिर मधुकर

जुदा तुम क्या हुए मुझसे ज़िन्दगी खो गई अब तोमेरी किस्मत जो जागी थी कहीं पे सो गई अब तोजलन मन में लिए अपनों ने बस सहरा को लूटा हैफ़सल नफरत की ना चाही मगर वो बो गई अब तोजिसकी मुस्कान की खातिर ज़माने से लड़े हरदमजुल्म इतना बढा वो परेशान हो के रो गई अब तोदिल की रेती पे उसके नाम को हाथों से लिख डाला लहर भी रूठ कर हर इक निशां को धो गई अब तोसमय तन्हाई का कटना सदा मुश्किल ही होता हैबोझ ये ज़िन्दगी मधुकर तेरी पर ढो गई अब तोशिशिर मधुकर

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