शरारत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

तेरी कुर्बत में हम भी ख्वाब सजाये बैठे हैंवस्ल ए निगाह में छुपकर दाव लगाये बैठै हैं।

भरोसा होता नहीं क्यूँ मुझे फिर से दिल लगानाएक असरे से मन में घेराव लगाये बैठे हैं।शरारत ना जाने कब शराफत लेकर आयेगीजिगर में दुखते जख्मों का स्त्राव लगाये बैठे हैं।अंगुलियों पे इस तरह कब तलक दिन गीनेंगे हममन के अरमान में इक तनाव लगाये बैठे हैं।रूबरू होते रहे तेरी नजरों में कई बारजिंदगी में किस्मत की हिसाब लगाये बैठे हैं।कुर्बत – समीपता, वस्ल – संयोग,

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12 Comments

  1. C.M. Sharma 26/11/2018
  2. Bindeshwar Prasad sharma 26/11/2018
    • C.M. Sharma 27/11/2018
      • Bindeshwar prasad sharma 28/11/2018
  3. डी. के. निवातिया 27/11/2018
  4. रामगोपाल सांखला ``गोपी`` 27/11/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 28/11/2018
  5. Bindeshwar Prasad sharma 28/11/2018
  6. SALIM RAZA REWA 03/12/2018
  7. Bindeshwar prasad sharma 03/12/2018
  8. kiran kapur gulati 10/12/2018
    • Bindeshwar prasad sharma 10/12/2018

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