सब याद है ज़रा ज़रा

सब याद है ज़रा ज़रा चाँदनी रातों का बीती बातों का महकती हवाओं का चहकती फ़िज़ाओं का भूली बिसरी यादों काकुछ कही अनकही बातों कासब याद है ज़रा ज़रा हार श्रृंगार के फूलों का खिलना मालती और कामनी का महकनाबढ़ते हुए क़दमों का ठिठकना कभी रुकना कभी चलनाकभी इतराना कभी मुस्कुराना मदहोशी से भरा समाँसब याद है ज़रा ज़रा गुमसुम मुस्कुराती चाँदनी मँद २ हवा में झूमती हर कली चलते २ कानों में कुछ कह जाती इक नक़्शा सा खींच जाती जैसे समाँ सा बाँध जाती हर याद है सताती वो तारों की छाँव और महकती हवा सब याद है ज़रा ज़रा नहीं काफ़ी चँद शब्दों में समेटना उन यादों को दिल में सहेजना चली आती हैं वो जाने अनजाने लौटा लाती हैं वो बीते ज़माने धुँधली ही सही पर सब याद है ज़रा ज़रा सब याद है ज़रा ज़रा

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 22/11/2018
    • kiran kapur gulati 22/11/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma 22/11/2018
    • kiran kapur gulati 22/11/2018
  3. C.M. Sharma 24/11/2018
  4. kiran kapur gulati 24/11/2018
  5. Ram Kishor Dubey 04/12/2018
  6. Kiran Kapur gulati 06/12/2018

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