काल जीवन का – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिसने की मुझसे न संग उसने निभाया हैअब तलक काल जीवन का ये मैंने तन्हा बिताया हैसभी बस छल गए मुझको लुटा बैठा हूँ मैं अब तक खेल चालाकी का ना माँ बाप ने मुझको सिखाया है यूँ तो गहरा समुन्दर है फिर भी ना प्यास मिट पाई किसी ने जाम नज़रों का जो ना मुझको पिलाया हैज़रा नज़रें घुमा के देखो फ़कत मेला है लोगों का किसी हमदम से ना पर वक्त ने मुझको मिलाया हैठोकरें लगती रहती हैं सम्भलता रहता हूँ फिर भी मगर इस राहे मंजिल ने मुझको अक्सर गिराया हैमैंने सेहरा की चाहत में गुलों को कुछ नहीं समझाहार कांटों का उनकी हाय ने मुझको दिलाया हैवो पर्वत झुक नहीं सकता यकीं सबको यही था परजलजले ने देख मधुकर उसको जड़ से हिलाया है शिशिर मधुकर

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6 Comments

  1. डी. के. निवातिया 19/11/2018
    • Shishir "Madhukar" 20/11/2018
  2. kiran kapur gulati 22/11/2018
    • Shishir "Madhukar" 22/11/2018
  3. Lalita 24/12/2018
    • Shishir "Madhukar" 25/12/2018

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