तलाश – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

खुद की तलाश में भटकता रहादुश्मनी के कारण अटकता रहा।कभी मैं सूली पर लटक गयाकभी खौफ में सिमटता रहा।खुदगर्ज क्या रास्ता दिखायेंगेकभी गिरा कभी संभलता रहा।जुनून इक जिद है अपने मन कीजो लटक गया सो लटकता रहा।धोखे बहुत खाये फरेबों सेवक्त पे आदमी बदलता रहा ।इंसान है क्या मैं समझने लगाउनके बीच रहके निखरता रहा।जीने के रास्ते बिन्दु मिल गयेठोकरें खाकर संभलता रहा।

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3 Comments

  1. Sukhmangal singh 12/11/2018
  2. C.M. Sharma 12/11/2018
  3. mani 14/11/2018

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