फिर से इक दीप जले दिल में

जो   बसा   अंधेरा   मन   में  हैपतझड़  सा  तन  सावन  में  हैदिल   में   भरे   ऐहसास   नहीवाणी   में   भी    उल्लास   नहीबेचैन  रहो  जो  तुम  दिन   भरहँस  न  पाओ  कभी  खिलकरराहों    में    कांटे     भरे    मिलेसारे    घाव    जब     हरे   मिलेपरेशानी  कैसी   भी   आ  जायेपर दिल में  यही  कामना आयेसच कुछ  ईमान   मिले दिल मेफिर से  इक  दीप  जले दिल मे

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भूल जाये  जब  पथिक राह कोतड़पे  फिर पाने  जो पनाह कोवो  देखे   पर्वत   चढ़ते   बादलऊँची    लहरों    वाले     सागरइक ज्योति जले दिल के भीतरमंजिल की ओर चले धीरज धरजब   प्रेमी   को   न  प्यार  मिलेप्रेम  के  बदले   प्रतिकार  मिलेप्यार   नही  जो  अधिकार  करेप्यार  वही   जो   स्वीकार   करेआशायें उमड़े फिर  साहिल  मेंफिर  से  इक  दीप जले दिल मे

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कुछ  हिस्से  जीवन  के  सुख मेंकुछ  हिस्से  जीवन  के  दुख मेंप्यार  की  दुनिया  है प्यार करोप्यार से सब पर अधिकार करोदेखो   निरंतर     बहती     धाराआश्रित  जिस  पर  जीवन  साराअगणित दीप  जलें  जब  थल  मेंप्रकाश  उमड़ आये नभ जल मेंमर्यादा  का  फिर  से  राम  मिलेहर राधा  का  फिर  श्याम  मिलेतन्हाई  बदल  जाये  महफ़िल मेंफिर से  इक  दीप  जले  दिल  में

 कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 08/11/2018

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