फिरंगी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

कहाँ कहाँ तुम बच पाओगेचारो तरफ फिरंगी है।समझ पाओगे उसको कैसेजो मन के सतरंगी है।गिरगिट सा वो रंग बदलताआदत उसकी गंदी है।लालच है रग रग में उसकाबनता खूब घमंडी है।काम वासना है नजरों मेंउड़ता उसी का झंडी है।पकड़ो पहले आँखें फोड़ोदेखो बड़ा उदण्डी है।मुँह में राम बगल में छूरीकाट देता वह मुण्डी है ।मालुम है कि पाप कर रहाफिर भी बना हुड़दंगी है।नीति राजनीति नहीं अछूतीये उसकी पगडंडी है।कितने भी इसको समझाओकरता वह नौटंकी है।किसके उपर है क्या भरोसाधूम रहा कौन सनकी है।एक दिन तो वो भी तड़पेगासुनता नहीं घमंडी है।

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  1. C.M. Sharma 01/11/2018

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