हां, हम झारखंडी है….(कवि पियुष राज ‘पारस’)

_”वैसे तो हम सब हिंदुस्तानी है ,पर ये कविता इसलिए लिखा हूँ क्योंकि जब झारखंड के लोग दूसरे राज्य जाते है तो वहां उनका वेश-भूसा ओर बोली का लोग मजाक उड़ाते है ,बहुत से लोग दूसरे राज्य में ये बोलने में शर्माते है कि वे झारखंड के है ,तब मैं लिखता हूँ_” 👇🏻*गर्व से कहते है हम कि**हां ,हम झारखंडी है*सीधे-साधे भोले-भालेजैसे भी है हम है निरालेसत्तू ,चूड़ा, प्याज ,रोटीजो कुछ भी हम खाते हैपर दूसरों के हक काहम कभी नही पचाते हैहां, चका-चौन्ध से दूर है हमपर हम नही पाखंडी हैगर्व से कहते है हम किहां ,हम झारखंडी हैहमारे रहन-सहन सेतुम हमें गंवार न समझोबहुत काबिलियत है हममेतुम हमें यूं बेकार न समझोसाहित्य ,कला ,खेल और समाजहर क्षेत्र में हमारा नाम है’धोनी’ जिसे कहती है दुनियावो इसी माटी का लाल हैऊंचे -ऊंचे ओहदे पर हैपर बिल्कुल नही घमंडी हैगर्व से कहते है हम कीहां, हम झारखंडी हैविरसा मुंडा ,सिधो-कान्होये इसी धरा के वीर हैदेश के खातिर मर मिटने कोयहां के न जाने कितने सूरवीर हैकम न आकों तुम हमकोहम भी किसी से कम नहीछेड़ दे कोई हमकोऐसा किसी मे दम नहीकाला हीरा ,लौह-इस्पातकोयलांचल में समाया हैपहाड़ ,नदियां ,ओर प्रकृति सेईश्वर ने इसे सजाया हैहरियाली की क्या बात करूंहमारा आंगन जैसे बनखंडी हैगर्व से कहते है हम किहां ,हम झारखंडी है© पियुष राज ‘पारस’दुमका ,झारखंड_अगर कविता अच्छी लगी हो तो शेयर जरूर करे….

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  1. C.M. Sharma 25/10/2018

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