मृदुल वाणी – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

उनके मुख मृदुल वाणी सेरस अमृत सुधा बरसता हैउनके प्रखर मुख मंडल सेऐसे ये भाल चमकता है।ज्ञान पराग की तुमड़ी सेकेसर का चूर्ण छलकता हैऐसे ज्ञानियों का क्या कहनाजो सागर सा मचलता है।महक जिनकी गुलमोहर सासारे जहाँ पर बिखरता हैमानस के संस्कृत पटल परह्दय दर्पन सा झलकता है।कृति की गौरव गाथा सेअमरत्व ज्योति निकलती हैये महापुरुष कहलाते हैंप्रीत का दीपक जलती है।पथ हमें दिखाने आते हैंसच्चा वह प्रेम बरसाता हैये युग पुरुष कहलाते हैंजब वक्त पड़े गरजता है।

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4 Comments

  1. Madhu tiwari 17/10/2018
  2. डी. के. निवातिया 18/10/2018
  3. C.M. Sharma 20/10/2018
  4. Rinki Raut 22/10/2018

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