जिंदगी और मौत का खेल

शुक्र है जिंदगी बाजार में खरीदी नहीं जाती lखरीदी जाती तो अमीरों की गुलाम बन जाती llअमीर फिर मौत को अपने इशारों पर नचाता lमौत की आगोश में सिर्फ गरीब ही सो पाता llजिंदगी गुलाम नहीं ना कोई वश में कर पाया है lजाना उन सभी को है ,जो इस दुनिया में आया है llफिर किस बात का है गुरुर, कैसा ये अहंकार है lजिंदगी पर तुम्हारा नहीं ऊपर वाले का अधिकार है llकब सांसो की डोरी टूट जाये पल भर का पता नहीं lकब कौन अपनों से बिछड़ जाये ये भी तो पता नहीं llसब खरीद लोगो पैसो से जिंदगी नहीं खरीद पाओगें lकितनी भी हो ताकत, इसे वश में नहीं कर पाओगें llमौत एक सच्चाई है, जो एक न एक दिन आयेगी lअमीर या गरीब सबको अपनी आगोश में सुलायेगी llछोड़ दे , अब इन कागज़ के टुकड़ो पर तू यूँ इतराना lक्योकि खाली हाथ हम आये , खाली हाथ है जाना ll——————-

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 16/10/2018
    • Rajeev Gupta 22/10/2018
  2. Madhu tiwari 17/10/2018
    • Rajeev Gupta 22/10/2018
  3. डी. के. निवातिया 18/10/2018
    • Rajeev Gupta 22/10/2018
  4. C.M. Sharma 20/10/2018
    • Rajeev Gupta 22/10/2018

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