मंजर – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

लुत्फ़ – ए-रवानी का अब सिलसिला देखियेइस बाग – ए – चमन में फूल इक खिला देखिये।है कितनी दिलकश, नहकतों वाली मंजरअब्रे बहार, इनकी शिकवा न गिला देखिये।नाजिर हम भी हैं तेरे, दिल – ए – जार मेरातहे – पा – ए – नाज का, अब बुलबुला देखिये।नियाज – ए-इश्क में, हम भी ऐसे उलझ गयेशोखी – ए-तहरीर, मन का चुलबुला देखिये।छोड़ दो सोहबत – ए-रिन्दा, दिल के तसब्बुरउनके रुखसार, अधरों का गुलगुला देखिये।दिलकश – आकर्षक, नहकतों-सुगंध, मंजर – दृश्य का अंश, अब्रे बहार – बहार के रंग, नाजिर – देखनेवाले, दिल-ए-जार – व्याकुलता, तहे – पा – नाज – सुंदरता के पैर के नीचे, नियाज – ए-इश्क – प्रेम की कामना, शोखी – ए – तहरीर – शरारत भरी लिखावट, सोहबत – ए-रिन्दा – रसिकों के संगत, तसब्बुर – ख्याल, रुखसार – गाल ।

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4 Comments

  1. Arun Kant Shukla 14/10/2018
    • Bindeshwar prasad sharma 15/10/2018
  2. Rinki Raut 16/10/2018
  3. Rajeev Gupta 16/10/2018

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