कातिल ये बहरे हैं – शिशिर मधुकर

भुला दो तुम मुझे चारों तरफ़ बैरी के पहरे हैंरोशनी अब नहीं दिखती अंधेरे इतने गहरे हैंसंभालो मत ना उठने दो तूफां को समुन्दर मेंलील जाएंगे सारी ज़िंदगी कातिल ये बहरे हैं तुम अपनी बात करते हो ज़रा मेरी तरफ़ देखो मेरे अल्फाज तो अब भी मेरे अधरों पे ठहरे हैंसच्चाई और होती है समझ में आ गया मुझको स्वपन ही दूर से सबको यहाँ लगते सुनहरे हैंमुकद्दर साथ ना दे तो विफल होती हैं तदबीरेंमधुकर से मुहब्बत में कभी परचम ना फहरे हैंशिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. Arun Kant Shukla 14/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 15/10/2018
  2. C.M. Sharma 15/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 15/10/2018

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