बोझ ये सारे – शिशिर मधुकर

फूल को अपनी खुशबू का पता थोड़े ही होता हैखुशी को बाँटता है वो फिर भी तन्हा ही रोता है किसी के होंठो पे मुस्कान जो भी ले के आता है उसी से जान लो वो कितना अपना चैन खोता है वो जो इतनी अकड़ अपनी ज़माने को दिखाता हैन जाने कितने लोगों के चरण हँस हँस के धोता हैज़िंदगी दूध की माफिक ही अपना रूप धरती हैवही माखन भी पाता है जो कि इसको बिलोता है अपने ग़म गलत करने को उसने साथ मांगा थामगर अब बोझ ये सारे फ़कत मधुकर ही ढोता है शिशिर मधुकर

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6 Comments

  1. Bhawana Kumari 12/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 13/10/2018
  2. Arun Kant Shukla 14/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 15/10/2018
  3. C.M. Sharma 15/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 15/10/2018

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