कैप्सूल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

फायदा थोड़ा भी नहीं, न ज्यादा नुकसान करेगासत्तू आटे की बनी कैप्सूल, न कोई पहचान करेगा।दवा के नाम पर, आज भी लूट अभी तक जारी हैलोग सभी जानते, इसमें लिप्त बड़े व्यापारी है।नकली असली का भला, पहचान अब कौन कैसे करेइंसान पैसों पर बिक जाता, फिर ध्यान कैसे करे।जहाँ भी आप जाइये, उलझ कर ही रह जाईयेगादलदल इतनी है हर जगह, फंस कर बह जाईयेगा।दवा – दारू – कचहरी – नेता, पुलिस भी पाजी निकलेचल रहा इसी तरह से देश, सब काम काजी निकले।कोई लूट रहा देश को, कोई डाल रहे डाकाकहीं पे सीना जोरी है, कहीं पर घूम रहे आका।हर अपराधी घूम रहे, देख आँखें लोग मूंद रहेहर डाल चमगादड़ झूल रहा, अपना शिकार ढ़ूढ रहा।अपने लोग लुटेरे हैं, दूसरे को फिर है क्या कहनायहाँ आश्वासन भाषन है, दूभर गरीबों का रहना।अंध विश्वास का बोल बाला, मस्त ऐसे में मतवालाराम रहीम संग मधुबाला, आशा राम संग है बाला।

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2 Comments

  1. डी. के. निवातिया 10/10/2018
  2. C.M. Sharma 11/10/2018

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