कुण्डलियाँ – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

  1. कुण्डलियाँ

01काल रुके ना बात से, ज्ञान बिके ना हाटटले नहीं होनी कभी , मृत पड़े जब घाट।मृत पड़े जब घाट, लगे सब रोने – धोनेसमझ गये सब बात, जीवन पड़ेंगे खोने।बदलो अपनी चाल, वक्त को कभी ना टालधर्म – कर्म प्रधान, जीवन का चलता काल।02तांबूल मुख चबा लिये, महफिल दिये जमायमंचों के उस्ताद से , जनता गये लुभाय ।जनता गये लुभाय , मजे में लगे झूमनेकर रहे वाह – वाह, हाथ को लगे चूमने।कहे बिन्दु कविराज, समझे सोचे माकूलहै वर्णन वेद में, पवित्र हरि प्रिय तांबूल।03दुख की निंदा ना करो, करो न चिंता कोयजो विधना है लिख दिया, फिर काहे को रोय।फिर काहे को रोय, है किस्मत का ये खेलना तेरा है कोय, दुनिया है बड़ा झमेल ।रहे नहीं संतोष, सोच में केवल है सुखजीवन के दो छोर, आये सुख तो कभी दुख।04नहीं चाहिये प्रीत अब, नहीं चाहिये मीतइज्जत अपनी बेचकर, नहीं चाहिये जीत।नहीं चाहिये जीत, दुनिया अंधी हो गयीऐसी है ये रीति , इतनी गंदी हो गयी।भ्रमित माया जाल, सुकून दिखती ही नहींढ़ूढ रहा सुख – चैन, मन मैला मिटती नहीं।

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2 Comments

  1. arun kumar jha 04/10/2018
  2. Bindeshwar Prasad sharma 05/10/2018

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