उम्मीदें कम नजर आती है

इस किनारे न अब कोई लहर आती हैआजकल उम्मीदें कम नजर आती है

सुबह से बेचैन बच्चे खिलखिला उठते हैशाम को काम करके जब माँ घर आती है

गाँव के खेतों ने लहराना छोड़ दियाखुशियाँ जो रहने को शहर जाती हैं

दबी हुई चीखें, बेदर्दी के आँसू हैये जो अख़बारों में खबर आती है

कभी हलचल मचा के गए थे तुमअब तो जिंदगी यूँ ही ठहर जाती है

ये सब बातें भी इतना कहर ढाती हैगजलों में भी न कोई बहर आती है

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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4 Comments

  1. C.M. Sharma 04/10/2018
  2. Bindeshwar Prasad sharma 04/10/2018
  3. arun kumar jha 04/10/2018

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