मैं

निर्लिप्त हो जियो जीवनमुक्त होने का यही रास्ता है सब सौंप के प्रभु चरणों में बेफ़िक्र मन हो जाता है मार्ग पकड़ो ऐसा जो शरण उसकी ले जाता है इक ज़र्रे सा वजूद हमाराप्रभु नाम में सिमट जाता है जब वो ही कर्ता वो ही धरता फिर कहॉं हूँ मैं प्रश्न सुलझ सा जाता है ख़ुद से जोड़ मैं को हम बन ग़ुब्बार इतराते हैं फटते ही उसके हवा से हम बह जाते हैं आकार जो पाया था हमने निराकार हो जाता है

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2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 29/09/2018
  2. kiran kapur gulati 30/09/2018

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