नज़ारा – डी के निवातिया

नज़ारा***कुछ इस तरह मुझ से किनारा कर लिया !मेरे अपनों ने घर-बसर न्यारा कर लिया !!समझता रहा जिन्हे ताउम्र मै खुद का हमदर्द !फूलों से ज़ज़्बातों को उन्होंने अँगारा कर लिया !!देखता हूँ नज़रे उठाकर तो ज़माना हँसता है !जब से उन्होंने मेरी और इशारा कर लिया !!अब करुँ भी उम्मीद फ़तह की, तो कैसे करूँ !अपनों ने साथ दुश्मनो का गँवारा कर लिया !!नहीं रही चाहत अब “धर्म” को किसी हित की !जब आँखों में उनकी बैर का नज़ारा कर लिया !!!!!डी के निवातिया

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8 Comments

  1. C.M. Sharma 26/09/2018
    • डी. के. निवातिया 19/11/2018
  2. kiran kapur gulati 29/09/2018
    • डी. के. निवातिया 19/11/2018
  3. Shishir "Madhukar" 29/09/2018
    • डी. के. निवातिया 19/11/2018
  4. Saviakna 30/09/2018
    • डी. के. निवातिया 19/11/2018

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