गज़ल तुमको क्या समझाऊं – शिशिर मधुकर

ग़ज़ल तुमको क्या समझाऊं मैं तो जज्बात कहता हूँमुहब्बत जिसने भी दी मुझको उन्हीं के साथ रहता हूँ सोच शब्दों में आती है कलम फिर चलती ही जाती हैबँध के साहिल की बाहों में फ़कत पानी सा बहता हूँउनके अल्फाज ही मेरी गहरी चोटों का मरहम हैंसहारे जिन के ले लेकर मैं तन्हा सब दर्द सहता हूँदूर से देखने वाले ना समझ पाएंगे कभी मुझकोदिखता पाषाण सा बाहर मैं तो भीतर से ढहता हूँग़ज़ल लिखनी है गर तुमको तो मन की कहो बातेंहर सीखने वाले से बस यही तरकीब मैं कहता हूँशिशिर मधुकर

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6 Comments

  1. Bindeshwar Prasad sharma 04/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 05/10/2018
  2. arun kumar jha 04/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 05/10/2018
  3. C.M. Sharma 05/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 05/10/2018

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