पत्तों से ढह गए – शिशिर मधुकर

सच के लिए हम तो यहाँ लड़ते ही रह गएअरमान ज़िन्दगी के सब पानी में बह गएराजा ही जब ख़राब हो जनता भी क्या करेमन मार कर के लोग अत्याचारों को सह गएकौवा जो मोती खा रहा है आज के समयये बात कितने गुणी जन पहले ही कह गएनैतिकता का इंसान की ऐसा हुआ पतनसच के ये महल ताश के पत्तों से ढह गएउम्मीद थी जिनसे की वो शायद करेंगे न्यायमधुकर वो ही हरदम यहाँ देते थे शह गए शिशिर मधुकर

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10 Comments

  1. Kiran Kapur Gulati 25/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 25/09/2018
  2. डी. के. निवातिया 25/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 25/09/2018
  3. C.M. Sharma 26/09/2018
  4. Shishir "Madhukar" 26/09/2018
  5. ANU MAHESHWARI 01/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 03/10/2018
  6. Rinki Raut 22/10/2018
    • Shishir "Madhukar" 22/10/2018

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