छंद – (कुण्डलियाँ) – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा – बिन्दु

नहीं चाहिये प्रीत अब, नहीं चाहिये मीतइज्जत अपनी बेचकर, नहीं चाहिये जीत।नहीं चाहिये जीत, दुनिया अंधी हो गयीकैसे यह सब रीत , इतनी गंदी हो गयी।भ्रमित माया जाल, सुकून दिखती ही नहीढ़ूढ रहा सुख – चैन, मन मैला मिटता नही।

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  1. C.M. Sharma 20/09/2018