कौन ढलना चाहे – डी के निवातिया

कौन ढलना चाहे**********है भला कौन मुसाफिर राह में जो संग चलना चाहेहर कोई चाहे नया रंग , मेरे रंग कौन ढलना चाहे !!हर किसी को है पसंद, अपनी राह नई कायम करेकदमो के निशाँ फिर पगडंडी में कौन बदलना चाहे !!बात जो हकीकत हो एक बार चालाकी से घुमा दो ,फिर कौन झूठ-सच का पता लगाने उलझना चाहे !!बाज़ीगरी का हुनर होता है क्या कोई उनसे सीखे,रस्सी का सांप बना सुलझे कैसे क्यों सुलझना चाहे !!जब अपने हाथ सेंकने में मग्न हो हर एक शख्सऐसे में कौन भला दूसरे की आग में जलना चाहे !!जिसे आदत लगी हो शाही मखमली बिस्तर कीवो भला फूंस की झोपड़ पट्टी में क्यों पलना चाहे !!विष भी निर्मल जल सा बहने लगे जब “धर्म” भरे बाज़ार में ,बेवजह शेयर की तरह, फिर कौन गिरना उछलना चाहे !!!डी के निवातिया===

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10 Comments

  1. अंजली यादव 18/09/2018
    • डी. के. निवातिया 26/10/2018
  2. Rinki Raut 18/09/2018
    • डी. के. निवातिया 26/10/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma 18/09/2018
    • डी. के. निवातिया 26/10/2018
  4. Shishir "Madhukar" 19/09/2018
    • डी. के. निवातिया 26/10/2018
  5. C.M. Sharma 19/09/2018
    • डी. के. निवातिया 26/10/2018

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