मुकद्दर से सदा हारा – शिशिर मधुकर

मिलन की आग अब जलती नहीं है तेरे सीने मेंमुझे भी अब नहीं इच्छा लबों का जाम पीने मेंज़माने ने मेरा पत्थर के माफिक रूप देखा हैअपने आंसू बहा लेता हूँ मैं भी सावन महीने में आज मझधार में फँस के किनारा ढूँढता हूँ मैंमैंने परखा नहीं कमजोरियां हैं इस सफीने मेंअगर डरता रहे हर वक्त कोई बात करने सेकहो क्या फायदा है इस जहाँ में ऐसे जीने मेंभले मैं पा नहीं सकता मुकद्दर से सदा हाराजान मधुकर की रहती है किसी ऐसे नगीने मेंशिशिर मधुकर

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4 Comments

  1. C.M. Sharma 15/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 16/09/2018
  2. Bhawana Kumari 15/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 16/09/2018

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