सारे वादे जो तोड़ गये – मनुराज वार्ष्णेय

मोहब्बत के इस बंधन में तुम , तन्हा सूना मुझको कर गयेप्यारी रौशन रातों को तुम , अश्कों की धारों से भर गयेमुझसे ऐसा क्या पाप हुआ , जो साथ मेरा ही छोड़ गएप्यार के जो हमने जोड़े , सारे वादे क्यों तोड़ गये तन मेरा सूखे पत्तों सा , बंजर धरती प्यासा मन थासब की रुसवाई थी मुझसे , न पास मेरे कोई घन थामेरा दिल था अंजान कभी , तुमसे मिलकर सब जान गयाक्या प्यार मोहब्बत होती है , सारे पहलू पहचान गयादिल के भीतर अरमान जगा , दुःख की रजनी को दूर भगाजो राह नयी मुझको दी उस , जीवन पथ को क्यों छोड़ गयेप्यार के जो हमने जोड़े , सारे वादे क्यों तोड़ गये तुम सागर की लहर बनकर , तन पर गिरना मुझ साहिल केअपने कोमल कर से छूकर , कुछ बोझ हटा देना दिल केइस दिल में जो भी प्यार भरा , उस पर अधिकार तुम्हारा हैसारी दुनिया पर जीत मिले , पर दिल तुमसे तो हारा हैशामिल जीवन में होकर के , मोहब्बत के बीज को बोकर केउस वृक्ष को फिर से उगा देना , जिसकी जड़ को तुम तोड़ गयेफिर से प्यार के जोड़ेंगे ,सारे वादे जो तोड़ गये कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया 10/09/2018
  2. mukta 11/09/2018
  3. C.M. Sharma 11/09/2018
  4. Vibhapathak 11/09/2018
  5. Vibhapathak 11/09/2018
  6. Divyanshu Gupta 11/09/2018
  7. Divyanshu Gupta 11/09/2018
  8. Bindeshwar prasad sharma 12/09/2018

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