मुकरनें से तुम्हारे – शिशिर मधुकर

मुहब्बत हो गई तुमसे मुझे अफसोस होता हैतुम्हारी बेरुखी से तन्हाइयों में दिल ये रोता हैकोई सपनों में आ के गर तुम्हें हरदम सताता है चैन की नींद वो इंसान फिर थोड़े ही सोता हैजिन्हें अपना बनाने को बैर अपनों से पाला था मुकरनें से तुम्हारे वो तो अब अपने भी खोता है न जाने क्या हुआ इस पेड़ पे कांटे निकल आएकोई भी जान कर के बीज तो ऐसे ना बोता है ये बादल मुहब्बत का बरसता ही क्यों रहता हैकैसे भी बचो मधुकर मगर फिर भी भिगोता हैशिशिर मधुकर

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया 10/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 11/09/2018
  2. ANU MAHESHWARI 10/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 11/09/2018
  3. mukta 10/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 11/09/2018
  4. C.M. Sharma 11/09/2018
    • Shishir "Madhukar" 11/09/2018

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