सृजन 1….सी.एम्.शर्मा (बब्बू) ….

सृजन करने निकला था….अपनी दुनियाँ का मैं….खुद को ग़ुम सा पाता हूँ….मैं खुद को पाना चाहता हूँ….हर कोई जानता है मुझे…पर मैं भूल जाता हूँ…कब अपनों में गैरों से…कब गैरों में अपनों से मिला…हर किसी से अब सम्भलना चाहता हूँ….हर किसी से गैर होना चाहता हूँ…मैं खुद को पाना चाहता हूँ…काले रात के साये में….नज़र आती है मेरी परछाई….पर दिन में ग़ुम हो जाती है क्यूँ….यह देखना चाहता हूँ….रात में जब भी हाथ बढ़ा छूना चाहा उसे…कर उजाला भाग जाती है मुझसे…वैर है उसीका मुझसे, जिसे…मैं पाना चाहता हूँ….सागर में गहरे उतरा था मैं भी…बिन सोचे समझे….मोतियों की नहीं पर…डूबने की चाह थी मुझे…न जाने सागर पल में….क्यूँ ख़फ़ा हो गया मुझसे…..छूते ही वो मुझे…काली रेत् का ढेर हो गया…मेरे निशाँ भी ले गया…रेत् से घरौंदे का सृजन किया…फिर खुद ही ढहा दिया मैंने…अपने को खड़ा रखना चाहता हूँ….खुद को पाना चाहता हूँ…कहाँ से शुरू करून…खोजना खुद को….काले बादल बीते वक़्त के…छा जाते हैं….उमस बढ़ती है…बिजलियाँ चमकती हैं…दिल आँखों में आ… ठहर सा जाता है….रास्ता मिलता नहीं लौट जाता है….और मैं…खुद को पाना भूल जाता हूँ….ताकता रह जाता हूँ….बस ताकता ही रहता हूँ….अनदेखी…अनचाही…निर्जन सी राह पर…जो मुझ जैसे ही दिखती है…खुद को पाता हूँ…शायद उसे भी इंतज़ार कि …कोई आये संवारने उसे…और मैं….फिर से सृजन करना चाहता हूँ…अपने ही हाथों अपना…सृजन करना चाहता हूँ…\/सी.एम्.शर्मा (बब्बू)

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8 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 27/08/2018
    • C.M. Sharma 06/09/2018
  2. Rajeev Gupta 27/08/2018
    • C.M. Sharma 06/09/2018
  3. Shishir "Madhukar" 27/08/2018
    • C.M. Sharma 06/09/2018
  4. Bhawana Kumari 04/09/2018
    • C.M. Sharma 06/09/2018

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