गई तू कहाँ छोड़ के

सावन सूना पनघट सूनासूना घर का अंगनाबहना गई तू कहाँ छोड़ के।दिन चुभते हैं काटों जैसेआग लगाए रैनाबहना गई तू कहाँ छोड़ के।बचपन के सब खेल खिलौने यादों की फुलवारीखुशियों की छोटी साइकिलपर करती थी तू सवारीविरह,पीर के पलछिन देकरहमें रुलाए बिधनाबहना गई तू कहाँ छोड़ के।बाग बगीचे अमराई में पपीहा कोयल कूकेसखियों के संग हंसी ठिठोलीकरती तू मन मोहेदे तुझको आशीष सभीतू ऐसे हंसती रहना।बहना गई तू कहाँ छोड़ के।इंद्रधनुष सी रंग बिरंगी सपनो की तस्वीरेंअरमानो की चूनर ओढ़ेबुनती है तदबीरेंजब तक आस न हो पूरीअब नही है दिल मे चैनाबहना गई तू कहाँ छोड़ के ।।ग़म के बादल गरज बरस कररोज भिगोते दामनपीर पहाड़ सी बांधे तन कोब्याकुल मन का मधुबनकहाँ छिपाऊँ तुझको कोईजुगत है बाकी अब नाबहना गई तू कहाँ छोड़ के।।गुजरे कितने दिन राखी केकितने बांधे धागेफिर भी साथ तुम्हारा छूटाहम है बड़े अभागेहाय ! तुम्हारी सौ टूटीअब अश्रु पलक पर हैं नाबहना गई तू कहाँ छोड़ के।।-देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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  1. C.M. Sharma 27/08/2018

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