जिंदगी संवरने का नाम नहीं लेती

        ये जिंदगी  संवरने का, नाम  नहीं लेतीउसे सोचने के अलावा, काम नहीं लेती…..देता  हूँ  हर  कीमत , तुम्हे  भूल  जाने  कीमगर मुँह मांगा भी , ये कुछ दाम नहीं लेती…..जानती  है  कि दर्द है ,  तुम्हारी यादों मेंभूलेगी तुमको इसलिये, जाम  नहीं  लेती…..हरदम सोचती तुझे , थककर चूर हो जायेफिर भी थोड़ा रुक कर , आराम नहीं लेती…..पहला ऐसा काम है , जो  मुकम्मल हुआ हैइतनी  जिद्दी  है  कि, ये  ईनाम  नहीं  लेती…..जब  तड़पन, उदासी, आँसू  से  भर चुकी हैफिर इन धड़कनों को तू , क्यों थाम नहीं लेती

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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4 Comments

  1. डी. के. निवातिया 25/08/2018
  2. Shishir "Madhukar" 26/08/2018

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