ये आलम हिज्र का – शिशिर मधुकर

करूँ इस दिल का क्या बोलो ये तन्हा रह नहीं सकतापीर रुक रुक मचलती है जो तुम से कह नहीं सकतामिलन की आस में ही तो ये सब नदियाँ उफ़नती हैंझील का जल तो बंधन में कभी भी बह नहीं सकताबड़ी मुद्दत हुईं तुमको मनाते लेकिन तुम नहीं पिघलेये आलम हिज्र का अब और तो मैं सह नहीं सकताएक दीवार नफ़रत की खड़ी कर दी है दुनिया नेकोई परबत ये थोड़े ही है कभी जो ढह नही सकताये परतें दिल की मेरी अब ज़माने भर ने देखी हैंतुम्हीं आओ कि मधुकर अब इन्हें तो तह नहीं सकताशिशिर मधुकर

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2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/08/2018
    • Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/08/2018

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