स्वतंत्रता

दासता की बेड़ियों से अब वतन आजाद हैजुल्म की पहेलियों से अब चमन आजाद हैलहू चमक रहा गगन में वीर बलिदानों काधरा से आ रही महक अब वतन आजाद हैकिंतु माँ भारती की आंख में नमी है क्योंधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी है क्योंसरहदों पे अब खड़े सशक्त पहरेदार हैंजो दुश्मनों को रौंद दे सशस्त्र तैयार हैभय से विमुक्त राजधानी गीत गा रही प्रतिक्षण स्वतंत्रता के उत्सव मना रहीकिन्तु माँ भारती की आंख में नमी है क्योंधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी है क्योंप्रगति के प्रकाश का दीप जल रहा है उन्नति के उल्लास का दौर चल रहा हैवक़्त के साथ नौजवानों का हूजूम हैहर ख़्वाब हकीकत में अब ढल रहा हैकिन्तु माँ भारती की आंख में नमी है क्योंधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी है क्योंपैरों तले रौंदते है लाज की पेटियों कोमाँ के लाल नोंचते हैं माँ की बेटियों कोहाय! चीख कर निर्भया दम तोड़ देती रोज कहीं मानवी शर्म से सर फोड़ लेतीदेख यह माँ भारती की आंख में नमी सी हैधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी सी हैरक्तरंजित है कलह से अब घरों की देहरियाँअहम की अंधी निगाहें भूली माँ की लोरियांरिश्तों में व्यापार की भूख है व्यसन हैअब कहीं मिलती नही है शिष्टता की रोटियांदेख यह माँ भारती की आंख में नमी सी हैधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी सी हैखिलने लगा है झूठ हृदयों में महकता फूल बनचुभने लगा है सत्य आंखों में विषैला शूल बनन्याय नीति नियम समर्पण राजनीति से दूर हैंबिलखती है मानवता मानव के दर पे धूल बनदेख यह माँ भारती की आंख में नमी सी हैधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी सी हैसब अन्न के भंडार भरे,भरे रह जाते हैंसारे धन के कुबेर खड़े,खड़े रह जाते हैभूख, भूखे बच्चों को निवाला बना लेती हैहाय! निर्धन निरीह हाथ धरे रह जाते हैंदेख यह माँ भारती की आंख में नमी सी हैधड़कने स्वतंत्रता की रुग्ण सी थमी सी हैदेवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 19/08/2018
  2. C.M. Sharma 20/08/2018

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