diary 2

1 दफ्न ही कर देते जो सब राज मेरे खुली फिजाओं से ये सदायें ना आती रूह में बसी जार-जार तक तेरी खुशबू छूकर फिर तुझे ये हवाऐं ना आती2 पत्थरों पर खून के निशान बहुत हैं कुर्बानियों के जलते हुये शमशान बहुत हैं सुलझने नहीं देते उलझे हालातों को लगता है अपने आस्तीन साँप बहुत हैं3 एक छूईमूई कमसीन लगती हो कभी मीठी कभी नमकीन लगती हो इजहारे इश्क तुमसे कैसे ना करूँ मेरे दहेज़ में आई जमीन लगती हो4 ज़माने की रूमानियों का दौर बताते हैं उसेमौजों की अटखेलियों का शोर बताते हैं उसेसजाकर रखते हैं कालीन फूलों कापर दरो-दीवार कुछ और ही बताते हैं उसे5सुर्ख लाल हैं आँखेलिए तस्वीर ख्वाब मेंकोई रात भर रोया हैछिपाकर मुँह किताब मेंपूछते हैं क्या अच्छालगता है मुझे उनमेंदिल बताऊँ या होंठदूँ क्या-क्या जवाब मैं

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