मैं आज घर से निकला हूँ

मैं आज घर से निकला हूँउन सपनो के लिएजो मेरे बाबा की पथराई आँखों ने देखी हैजो मेरी माँ के बहते आँसू ने मुझसे कहा हैजो मेरे बहन के हाथो सेबंधी राखी ने कहा है मुझसेमैं उसके लिए आज घर से निकला हूँ.आज जाते-जाते कदम ठिठक से जा रहे मेरेमेरे आम का बगीचा छूट रहा मुझसेमेरे गाँव में बजती मंदिर की घंटियाँ रोक रही मुझेरोक रहा मुझे मेरे गाँव का पोखरऔर रोक रही मुझे उसकी मछलियाँऔर रोक रही मुझे माँ की लोरियाँ.आज जाते-जातेडर भी लग रहा मुझेक्या जो उम्मीद मेरे पिता की बूढी होती लाठी ने की है मुझसेक्या पूरा कर पाऊंगाक्या मैं अपनी माँ की पुरानी होती साडी के बदलेनयी साड़ी दिलवा पाऊंगा.आज जाते-जाते थोड़े बेसन की लड्डू और आलू के पापड़ ले कर निकला हूँथोडे चने और सत्तू ले कर निकला हूँऔर माँ-बाबा के होंसलों को ले कर निकला हूँमैं अपने कल के लिएआज घर से निकला हूँ—-अभिषेक राजहंस

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  1. Bhawana Kumari 26/07/2018

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