प्रेम के बंधन – शिशिर मधुकर

तसव्वुर में तुम्हारे कट रहे हैं रात दिन अब तो ऐसे ही पास जीवन में नहीं आ पाते हैं सब तो तुम्हें नाराज़ होने का मैंने हक़ दे दिया सारा मगर नाराज़ होने जैसी कोई बात हो जब तो मैंने तुमको नहीं बोला मुझे तुम भी अपनाओ तुम्हीं ने हाथ दोनों थाम लिए ज़ोर से तब तो किन्हें समझाओगे तुम यहाँ पर प्रेम के बंधन किसी को मान बैठा है कोई जो अपना ही रब तो इतनी दूरी मुहब्बत में कभी होती नहीं अच्छी दर्द के मारे सोचो खुल गए जो मेरे भी लब तो शिशिर मधुकर

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10 Comments

  1. C.M. Sharma 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018
  2. kiran kapur gulati 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018
  3. ANU MAHESHWARI 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018
  4. bhupendradave 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018
  5. Dr Swati Gupta 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018

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