दरिया से बहते हैं – शिशिर मधुकर

मुहब्बत कर तो ली हमने मगर अब दर्द सहते हैंतन्हाई तोड़ती है पर किसी को कुछ ना कहते है समय की धार को बदले नहीं ऐसा कोई जग मेंयही तो जान कर चुपचाप हम दरिया से बहते हैं खुद की हस्ती मिटा देते हैं जो रिश्ते निभाने मेंलहू बन के जिगर का वो सदा अपनों के रहते हैंमकां ऊँचा बना लो पर अगर ना नींव को सींचाज़रा सी चोट लगने पर ही वो पत्तों से ढहते हैंअभी भी वक्त है मधुकर लो फिर से जतन कर लें जवानी के हसीन लम्हें उमर भर थोड़ी रहते हैंशिशिर मधुकर

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया 21/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 21/07/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma 21/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 21/07/2018
  3. C.M. Sharma 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018
  4. ANU MAHESHWARI 23/07/2018
    • Shishir "Madhukar" 23/07/2018

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