मन रुपी मानुष – डी के निवातिया

मन रुपी मानुष..

श्रावण छवि धारण कर ली,मन-मस्तिष्क के घुमड़ते मेघो ने,वर्षा होने लगी है अब,नयनो के समुन्द्र से अश्को की,ध्वंसावशेष के अवयव में,कुछ आर्द्रता का एहसास होने लगा,मृदा भी गीली हो गई,अरमानो के इस बंज़र कृषिक्षेत्र की,पनपने लगे है…,अहसास, कुछ खट्टे से, कुछ मीठे से,अंकुर ज्यो-ज्यों फूटेंगे,भावो के मन में, लहलाने लगेगी,फसल, प्रेम से लदे लबो कि मुस्कान लिए,फलों-फूलों सी,खिल उठता है रोम-रोम,खुल जाती है, पुलकित मन कि गिरहेंझूम-झूम गाने लगता फिर,कण-कण बिखेरता सोंधी सोंधी खुशबूपूरे शबाब पर होता है फिर,सौंदर्य से परिपूर्ण, सावन का रूप, निखर उठता हैऔर, मन रुपी मयूर, मद-मस्ती नाचने लगता है !श्रृंगार का ये अप्रतिम रूप,कहाँ मिल पाता है इस आत्मा कोवंचित रह जाता है इससे,भटकता है, पल-पल, विलासिता कि खोज मेंऔर फिर एक दिन खो जाता हैरह जाता उसी में विलीन होकर,ये मन रुपी मानुष…………… !!

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डी के निवातिया

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 16/07/2018
    • डी. के. निवातिया 08/08/2018
  2. Bhawana kumari 17/07/2018
    • डी. के. निवातिया 08/08/2018
  3. ANU MAHESHWARI 18/07/2018
    • डी. के. निवातिया 08/08/2018
  4. C.M. Sharma 19/07/2018
    • डी. के. निवातिया 08/08/2018
  5. meena29 19/07/2018
    • डी. के. निवातिया 08/08/2018

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